संस्कार एवं गृह पूजा

मुंडन संस्कार (चूड़ाकर्म) — शिशु का प्रथम केश-कर्तन

बालक का प्रथम केश-कर्तन एक संस्कार के रूप में — मुहूर्त, प्रथम कर्तन से पूर्व पूजन, और कुल-रीति अनुसार केशों का अर्पण।

प्रथम, तृतीय अथवा पंचम वर्ष में मुंडन (चूड़ाकर्म) — घर, तीर्थ अथवा कुलदेवता के स्थान पर: पूजन, मंत्रों सहित प्रथम केश-कर्तन, और केशों का अर्पण।

इसमें सम्मिलित

  • पंचांग एवं बालक की कुंडली से मुहूर्त
  • संकल्प, गणेश पूजन एवं कलश स्थापना
  • मंत्रोच्चार सहित प्रथम केश-कर्तन
  • कुल-परंपरा अनुसार शिखा
  • हवन, केश-अर्पण एवं आशीर्वाद

मुंडन के विषय में परिवारों से प्रायः कहा जाता है कि इससे बाल घने उगते हैं, अथवा इससे पिछले जन्म का कोई शेष उतर जाता है, और यह कि यदि अमुक मंदिर में न हुआ तो बालक को कष्ट होगा। हर ऋतु में ये दोनों बातें मेरे कानों तक आती हैं। चूड़ाकर्म — मुंडन का प्राचीन नाम — घर का संस्कार है: बालक के केश पहली बार संकल्प, पूजन और मंत्रों के साथ काटे जाते हैं, उस वर्ष और उस स्थान पर जो कुल की परंपरा निर्धारित करे। यह केशों का उपचार नहीं, और न कोई बालक इसलिए कष्ट पाता है कि परिवार ने दूर के तीर्थ के स्थान पर अपना आँगन चुना।

मुंडन का वर्ष

मनुस्मृति चूड़ाकर्म को प्रथम अथवा तृतीय वर्ष में रखती है, और गृह्यसूत्र भी लगभग यही कहते हैं — इस जोड़ के साथ कि निर्णय कुल-धर्म के अनुसार भी हो सकता है। इस अंचल में प्रचलन विषम वर्ष का है: पहला, तीसरा या पाँचवाँ, और कुछ कुलों में सातवाँ। कोई घर किस वर्ष को मानता है, यह प्रायः इससे तय होता है कि पिता और पितामह का मुंडन कब हुआ था। कुछ सुझाने से पहले मैं यही पूछता हूँ।

अवध के अनेक घरों में कन्याओं का मुंडन भी उन्हीं विषम वर्षों में होता है। कुछ घरों में केवल पुत्रों का होता है, अथवा कन्या के केश मूँडने के स्थान पर थोड़े कतरे जाते हैं। मैं कुल की रीति का अनुसरण करता हूँ, और किसी एक को अधिक शुद्ध नहीं मानता।

मुहूर्त का चयन

वर्ष निश्चित हो जाए तो दिन पंचांग और बालक की कुंडली से निकलता है। मैं तिथि, वार, नक्षत्र और बालक का चंद्र बल देखता हूँ। रिक्ता तिथियाँ — चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी — और अमावस्या प्रायः टाली जाती हैं, और बहुत से परिवार शुक्ल पक्ष को प्राथमिकता देते हैं। अधिकांश परिवार अन्य संस्कारों की भाँति खरमास और चातुर्मास में भी मुंडन नहीं करते।

पूर्वांचल में चैत्र और शारदीय नवरात्रि में देवी-स्थानों पर मुंडन का बड़ा प्रचलन है। यदि यह कुल की रीति हो, तो मैं नवरात्रि के भीतर ही दिन चुनता हूँ। मैं वर्ष भर की मुंडन-तिथियों की सूची प्रकाशित नहीं करता। उचित दिन बालक, कुल की परंपरा और स्थान पर निर्भर है — और स्थान प्रायः परिवारों की अपेक्षा से अधिक निर्णायक होता है, क्योंकि तीर्थ की यात्रा मुहूर्त के अनुसार नियोजित करनी होती है, उसके बाद नहीं।

मुंडन कहाँ होता है

मुंडन सामान्यतः तीन स्थानों में से किसी एक पर होता है, और प्रायः कुल की परंपरा ही इनमें से चुनती है:

  • घर पर — आँगन अथवा पूजा-स्थान में, आरंभ में कुलदेवता के स्मरण के साथ।
  • तीर्थ पर — प्रयागराज, काशी और हरिद्वार जैसे गंगा-घाट मुंडन के लिए सदा से चुने जाते रहे हैं, और विंध्याचल वह देवी-क्षेत्र है जहाँ पूर्वांचल के अनेक परिवार इसके लिए जाते हैं।
  • कुलदेवता अथवा कुलदेवी के स्थान पर — जहाँ कुल की पिछली पीढ़ियों का मुंडन हुआ था।

स्थान परंपरा से तय हो, भय से नहीं। यदि कुल की रीति किसी दूर के स्थान की है और इस वर्ष यात्रा कठिन है, तो मैं चाहूँगा कि परिवार किसी छोटे बालक को जल्दी में दूर ले जाने के स्थान पर अगले उचित मुहूर्त की प्रतीक्षा करे। परिवार के आग्रह पर मैं तीर्थ अथवा कुलदेवता के स्थान पर जाकर संस्कार सम्पन्न कराता हूँ, उस स्थान की अपनी मर्यादा का पालन करते हुए।

संस्कार की विधि

विधि लगभग डेढ़ घंटा लेती है। माँ बालक को गोद में लेकर पिता के समीप बैठती हैं, और जो क्रम मैं अपनाता हूँ वह यह है:

  1. संकल्प — पिता कुल, गोत्र, तिथि और स्थान का उच्चारण करते हुए बालक के चूड़ाकर्म का संकल्प लेते हैं।
  2. गणेश पूजन, कलश स्थापना और कुलदेवता का स्मरण; जहाँ कुल में प्रचलन हो, मातृका पूजन और नांदी श्राद्ध भी।
  3. केशों की तैयारी — मंत्रोच्चार के साथ केशों को गुनगुने जल से भिगोया जाता है। गृह्यसूत्र काटने से पूर्व केशों में कुश रखने का विधान बताते हैं।
  4. प्रथम केश-कर्तन — पिता, अथवा कुल की रीति जिसे निर्दिष्ट करे, मंत्रों के साथ पहली लटें काटते हैं। तत्पश्चात् नाई बालक को थामे रखकर धीरे-धीरे मुंडन पूर्ण करता है।
  5. शिखा — जहाँ कुल में शिखा रखने की परंपरा है, सिर के मध्य भाग में छोटी सी चोटी छोड़ी जाती है।
  6. केश ग्रहण — अवध के अनेक घरों में बुआ अपने आँचल में केश ग्रहण करती हैं। अर्पण के लिए केश एकत्र रखे जाते हैं।
  7. स्नान और हवन — बालक को स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं, और लघु हवन होता है, अग्नि बालक से दूर रखते हुए।
  8. आशीर्वाद, और केशों का अर्पण।

केशों का अर्पण

शास्त्रीय पद्धतियाँ बताती हैं कि केश गोबर में रखकर गोशाला में अथवा जल के समीप भूमि में गाड़े जाएँ। आज अधिकांश परिवार उन्हें गंगा अथवा किसी नदी में प्रवाहित करते हैं, या जिस स्थान पर मुंडन हुआ वहाँ की रीति के अनुसार वहीं अर्पित करते हैं। कुछ परिवार उन्हें किसी वृक्ष की जड़ में दबा देते हैं। रीति जो भी हो, केशों को आदर से सँभाला जाता है, दिन के कचरे के साथ फेंका नहीं जाता।

उसी दिन कर्णवेध

कुछ परिवार मुंडन के साथ कर्णवेध — कान छेदने का संस्कार — भी जोड़ लेते हैं। यह एक पृथक् संस्कार है, जिसके मुहूर्त का अपना विचार है। परिवार दोनों एक साथ करना चाहे तो तिथि निकालते समय मैं यह स्पष्ट कर देता हूँ, और कान छेदने का कार्य परिवार का कोई विश्वसनीय व्यक्ति करता है।

उस दिन बालक की देखभाल

मुंडन एक छोटे बालक का होता है, जिसने इसे माँगा नहीं। दिन को सहज बनाने वाली अधिकतर बातें साधारण देखभाल की हैं:

  • दिन का वह समय चुनिए जब बालक प्रायः शांत रहता हो और भोजन कर चुका हो।
  • ऐसा नाई हो जिस पर परिवार विश्वास करता है, नए ब्लेड के साथ, जो धीरे-धीरे काम करे।
  • पूरे समय माता अथवा पिता बालक को गोद में रखें, और कोई परिचित खिलौना या परिचित स्वर पास रहे।
  • स्नान के बाद सिर को तेज़ धूप से ढककर रखिए।
  • यदि बालक अस्वस्थ हो, अथवा सिर या त्वचा में कोई समस्या हो, तो तिथि आगे बढ़ाइए और अपने चिकित्सक से परामर्श लीजिए। संस्कार प्रतीक्षा कर सकता है।

परिवार क्या व्यवस्था करे, और मैं क्या लाता हूँ

परिवार नाई, स्थान, बालक के नए वस्त्र, कुलदेवता की रीति जो अर्पण माँगे वह, और पूजन सामग्री की व्यवस्था करता है। तिथि निश्चित होते ही मैं सामग्री की सूची व्हाट्सऐप पर भेज देता हूँ। मुंडन तीर्थ पर हो तो यात्रा और ठहरने की योजना परिवार बनाता है; मैं बता देता हूँ कि विधि में कितना समय लगेगा, ताकि यात्रा उसके अनुसार व्यवस्थित हो। मैं विधि लाता हूँ — संकल्प, मंत्र और क्रम — और प्रत्येक चरण होते समय परिवार को उसका अर्थ बताता चलता हूँ।

परिवार से मुझे क्या चाहिए

  • मुहूर्त के लिए बालक की जन्म तिथि, समय और स्थान।
  • कुल की परंपरा किस वर्ष की है, और शिखा रखी जाती है या नहीं।
  • मुंडन कहाँ होना है, और उस स्थान का कोई नियम जो परिवार को ज्ञात हो।
  • क्या कर्णवेध भी साथ में होना है।
  • संस्कार घर से बाहर हो तो वे तिथियाँ जिनमें परिवार यात्रा कर सकता है।

मुंडन कहाँ सम्पन्न होता है

मैं सुलतानपुर और आसपास के जनपदों में घर पर मुंडन संस्कार सम्पन्न कराता हूँ, और भारत में अन्यत्र भी जाता हूँ — परिवार द्वारा चुने गए तीर्थ अथवा कुलदेवता के स्थान सहित। मुंडन ऑनलाइन नहीं हो सकता; बालक को अग्नि और नाई के सामने उपस्थित होना ही होता है। विदेश में बसे परिवारों के लिए वर्ष और मुहूर्त का विचार व्हाट्सऐप अथवा वीडियो कॉल पर हो सकता है, और बहुत से परिवार अगली भारत-यात्रा पर मुंडन करते हैं — यदि पहला विषम वर्ष निकल गया हो तो अगले विषम वर्ष में।

संस्कार का भाव

चूड़ाकर्म बालक के जीवन का वह क्षण है जब परिवार पहली बार उसके शरीर पर एक संस्कार करता है जिसे वह स्वयं देख और अनुभव कर सकता है। इसीलिए मैं परिवारों से कहता हूँ कि भीड़, ढोल और फोटो से पहले बालक की सहजता को रखें। संकल्प शांत स्वर में हो, नाई का हाथ धीमा हो, और माँ की गोद पास हो — तो वही दिन बालक के लिए भय का नहीं, आशीर्वाद का दिन बनता है।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

मुंडन किस आयु में करना चाहिए?
विषम वर्ष में — पहला, तीसरा या पाँचवाँ, और कुछ कुलों में सातवाँ। मनुस्मृति और गृह्यसूत्र प्रथम अथवा तृतीय वर्ष बताते हैं और कुल की अपनी परंपरा के लिए स्थान छोड़ते हैं। अधिकांश घर वही मानते हैं जो पिता और पितामह के लिए किया गया था। यदि वह वर्ष निकल गया हो, तो अगला विषम वर्ष चुना जाता है, और दिन पंचांग तथा बालक की कुंडली से निकाला जाता है।
क्या मुंडन मंदिर के बजाय घर पर हो सकता है?
हाँ। संकल्प, गणेश पूजन, मंत्रों सहित प्रथम केश-कर्तन और लघु हवन के साथ घर पर किया गया मुंडन पूर्ण चूड़ाकर्म है। तीर्थ और कुलदेवता के स्थान इसलिए चुने जाते हैं कि कुल की परंपरा वहाँ ले जाती है, इसलिए नहीं कि घर की विधि कमतर है। यदि आपकी रीति किसी देवस्थान की है और इस वर्ष यात्रा कठिन है, तो छोटे बालक को जल्दी में ले जाने के स्थान पर उचित मुहूर्त की प्रतीक्षा कीजिए।
क्या लड़कियों का भी मुंडन होता है?
इस अंचल के अनेक घरों में हाँ, पुत्रों की भाँति उन्हीं विषम वर्षों में। कुछ घरों में केवल पुत्रों का मुंडन होता है, अथवा कन्या के केश मूँडे नहीं, थोड़े कतरे जाते हैं। दोनों जीवित परंपराएँ हैं। मैं कुल की रीति का अनुसरण करता हूँ; जहाँ परिवार कन्या का मुंडन चाहे, वहाँ वही संकल्प और पूजन होता है, और मैं किसी एक रीति को अधिक शुद्ध नहीं मानता।
मुंडन के बाद बालों का क्या करें?
अधिकांश परिवार केशों को गंगा अथवा किसी नदी में प्रवाहित करते हैं, या जिस देवस्थान पर मुंडन हुआ वहाँ की रीति के अनुसार वहीं अर्पित करते हैं। शास्त्रीय पद्धतियाँ केशों को गोबर में रखकर गोशाला में अथवा जल के समीप गाड़ने की बात कहती हैं, और कुछ परिवार उन्हें किसी वृक्ष की जड़ में दबाते हैं। रीति जो भी हो, केश आदर से सँभाले जाते हैं, फेंके नहीं जाते।
क्या नवरात्रि में मुंडन कर सकते हैं?
हाँ। पूर्वांचल के बहुत से परिवार देवी-स्थान पर मुंडन के लिए चैत्र अथवा शारदीय नवरात्रि चुनते हैं, और यह पुरानी परंपरा है। नवरात्रि के भीतर भी दिन पंचांग और बालक की कुंडली से ही चुना जाता है। यदि कुल की रीति घर पर अथवा किसी अन्य देवस्थान पर मुंडन की है, तो नवरात्रि आवश्यक नहीं; उचित वर्ष का कोई भी शुभ मुहूर्त पर्याप्त है।
अवधि
लगभग डेढ़ घंटा
आयोजन स्थल
घर, तीर्थ अथवा कुलदेवता का स्थान
दूरभाष
+91 94547 82346
WhatsApp पर तिथि पूछें

मुंडन संस्कार (चूड़ाकर्म) — शिशु का प्रथम केश-कर्तन

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