संस्कार एवं गृह पूजा
वैदिक विवाह संस्कार (हिन्दू विवाह विधि)
वैदिक विवाह की सम्पूर्ण विधि — द्वार पूजा, कन्यादान, पाणिग्रहण, लाजा होम एवं सप्तपदी — मंडप में शास्त्रोक्त क्रम से।
विवाह स्थल अथवा घर पर वैदिक विवाह संस्कार: द्वार पूजा, कन्यादान, पाणिग्रहण, लाजा होम, सप्तपदी एवं सिंदूर दान — पंचांग से निकाले गए लग्न में।
इसमें सम्मिलित
- पंचांग से मुहूर्त एवं लग्न निर्धारण
- द्वार पूजा एवं गौरी–गणेश पूजन
- गोत्रोच्चार सहित कन्यादान
- पाणिग्रहण, लाजा होम एवं अग्नि परिक्रमा
- सप्तपदी, सिंदूर दान एवं आशीर्वाद
- तिथि निश्चित होने पर व्हाट्सऐप पर सामग्री सूची
अधिकांश परिवार मेरे पास तब आते हैं जब विवाह की आधी योजना सभागार, भोजन और बारात के पहुँचने के समय के इर्द-गिर्द बन चुकी होती है, और विधियाँ मन में एक ही लंबे कार्य के रूप में दर्ज होती हैं — ‘फेरे’। किसी से कहा गया होता है कि सभागार खाली करना हो तो पंडित जी चालीस मिनट में ‘शादी करा देंगे’; किसी से यह कि विधि भोर तक ही चलेगी, क्योंकि सदा से चलती आई है। दोनों बातें अधूरी हैं। विवाह संस्कार अनेक पृथक् विधियों का क्रम है — प्रत्येक का अपना मंत्र, अपना अर्थ — और कुल की रीतियाँ उसी मूल के चारों ओर पनपती हैं। जब परिवार जानता है कि कौन सी विधि क्या है, तब समय के दबाव में कुछ आवश्यक नहीं कटता, और कोई सजावटी रस्म व्रत समझ ली नहीं जाती।
विवाह संस्कार क्या है
षोडश संस्कारों में विवाह वह संस्कार है जिस पर गृहस्थ के शेष संस्कार टिके हैं। गृह्यसूत्र इसे अग्नि-कर्म के रूप में वर्णित करते हैं: वर और कन्या दोनों कुलों की उपस्थिति में अग्नि को साक्षी मानकर वचन देते हैं। फेरे इसका अंग हैं, सम्पूर्ण नहीं। उनसे पूर्व कन्यादान है, उनके पश्चात् सप्तपदी। जो विवाह संगीत और भोज को पूरा रखे पर मंत्रों में जल्दी करे, उसने उत्सव तो रख लिया, संस्कार को क्षीण कर दिया।
कुंडली मिलान, यदि परिवार चाहे, इससे बहुत पहले एक पृथक् विचार के रूप में होता है। गुण मिलान क्या नापता है और क्या नहीं, इस पर मैं अलग से लिख चुका हूँ। मंडप पर वह प्रश्न दोबारा नहीं खोला जाता। संकल्प के क्षण तक दोनों परिवार अपना निर्णय कर चुके होते हैं।
मूल विधियाँ, जिस क्रम में मैं सम्पन्न कराता हूँ
नीचे का क्रम वह है जो मैं उत्तर भारतीय विवाह में अपनाता हूँ। कुल की परंपरा इनके बीच और विधियाँ जोड़ सकती है, और जनपद-जनपद में नाम बदल जाते हैं, किंतु मूल नहीं बदलता।
- द्वार पूजा (द्वारचार) — बारात द्वार पर पहुँचती है तो कन्या के पिता वर का स्वागत करते हैं। तिलक, आरती और अभिनंदन होता है; पुरानी भाषा में वर को द्वार पर पधारे विष्णु-स्वरूप अतिथि के रूप में पूजा जाता है।
- गौरी–गणेश पूजन — कन्या प्रायः मंडप में आने से पूर्व गौरी की आराधना करती है। मंडप में सर्वप्रथम गणेश पूजन, कलश स्थापना तथा नवग्रह आवाहन होता है।
- कन्यादान — पूर्ण संकल्प के साथ कन्या के माता-पिता उसका हाथ वर के हाथ में रखते हैं। दोनों पक्षों का गोत्रोच्चार होता है — गोत्र तथा तीन पीढ़ियों के नाम — ताकि दो वंश जुड़ने से पूर्व उच्च स्वर में नामित हों।
- पाणिग्रहण — वर ऋग्वेद के मंत्र ‘गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तम्’ के साथ कन्या का दाहिना हाथ ग्रहण करता है — सौभाग्य के लिए मैं तुम्हारा हाथ थामता हूँ।
- अग्नि स्थापना एवं लाजा होम — अग्नि स्थापित कर घृत और समिधा से प्रज्वलित की जाती है। कन्या का भाई उसकी अंजलि में लाजा (धान का लावा) भरता है और वह उसे अग्नि में अर्पित करती है। गृह्य क्रम में अश्मारोहण भी है — कन्या शिला पर पैर रखती है और उससे शिला-सी स्थिरता की कामना की जाती है। तदनंतर दंपती अग्नि की परिक्रमा करते हैं।
- सप्तपदी — सात पग, प्रत्येक का अपना मंत्र: अन्न के लिए, बल के लिए, गृह की समृद्धि के लिए, सुख के लिए, उस पशुधन के लिए जो कभी गृहस्थी की आजीविका था, ऋतुओं के लिए, और सातवाँ मैत्री के लिए — ‘सखे सप्तपदी भव’, सात पग साथ चलकर मेरे सखा बनो।
- सिंदूर दान एवं मंगलसूत्र — वर कन्या की माँग में सिंदूर भरता है और कुल-परंपरा के अनुसार मंगलसूत्र धारण कराता है।
- आशीर्वाद — दोनों कुलों के वरिष्ठजन दंपती को आशीष देते हैं। जहाँ परंपरा हो, ध्रुव तारे का दर्शन कराया जाता है, अटलता के प्रतीक के रूप में।
फेरे और सप्तपदी
उत्तर भारत के बड़े भाग में ‘सात फेरे’ का अर्थ अग्नि की सात परिक्रमाएँ है, और सात पग उन्हीं में समा गए हैं। गृह्यसूत्र के क्रम में परिक्रमाएँ लाजा होम का अंग हैं, और सप्तपदी एक पृथक् विधि। जहाँ कुल की रीति दोनों को एक कर देती है, वहाँ मैं रीति का सम्मान करता हूँ, किंतु प्रत्येक पग पर स्पष्ट कहता हूँ कि कौन सा मंत्र किस विधि का है — ताकि एक विधि दूसरी में खो न जाए।
लोकाचार और कुल की रीतियाँ
अवध के विवाहों में ऐसी बहुत सी बातें होती हैं जिनका किसी सूत्र में उल्लेख नहीं: हल्दी, मंडप पर स्त्रियों के मंगलगीत और गारी, दीवार पर बना कोहबर, देहरी पर होने वाले नेग और खेल। बिहार, राजस्थान अथवा दक्षिण से आए परिवार अपनी रीतियाँ साथ लाते हैं। मैं किसी से इन्हें छोड़ने को नहीं कहता; परिवार इन्हीं के साथ विवाह करता है। मेरा एक ही नियम है — क्रम। लोकाचार मूल विधियों के चारों ओर रहते हैं, उनके स्थान पर नहीं। समय कम हो तो रीतियाँ सिकुड़ सकती हैं; कन्यादान का संकल्प, पाणिग्रहण, लाजा होम और सप्तपदी नहीं।
मुहूर्त और लग्न
विवाह की तिथि किसी सूची से नहीं उठाई जाती। मैं उसे पंचांग से, और जहाँ उपलब्ध हों वहाँ दोनों की कुंडलियों से निकालता हूँ। उत्तर भारत के अधिकांश परिवार खरमास — जब सूर्य धनु राशि में हों, और पुनः मीन में — तथा देवशयनी से देवोत्थान एकादशी तक के चातुर्मास में विवाह नहीं करते। गुरु अथवा शुक्र के अस्त काल को टाला जाता है। विवाह के लिए परंपरा जिन नक्षत्रों को श्रेष्ठ मानती है — रोहिणी, मृगशिरा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, रेवती आदि — उन्हें खोजा जाता है। कन्या का गुरु बल, वर का सूर्य बल और दोनों का चंद्र बल देखा जाता है।
चुने हुए दिन के भीतर मैं लग्न निश्चित करता हूँ — वह राशि जो कन्यादान और फेरों के वास्तविक समय पर उदित होगी। इसीलिए मैं परिवार से पूछता हूँ कि बारात वास्तव में कब पहुँचेगी, न कि निमंत्रण-पत्र पर क्या छपा है। मैं वर्ष भर की विवाह-तिथियों की सूची प्रकाशित नहीं करता। जो तिथि एक दंपती की कुंडलियों के अनुकूल हो, आवश्यक नहीं कि दूसरे के भी अनुकूल हो; और ऐसी सूची परिवारों को पहले सभागार बुक करने और बाद में पूछने का निमंत्रण देती है।
विधि में कितना समय लगता है
बिना जल्दबाज़ी के मूल विधियाँ चार से छह घंटे लेती हैं। इस अंचल में विवाह प्रायः रात भर चलते हैं, क्योंकि बारात देर से पहुँचती है और द्वार पूजा तथा भोजन मंडप से पहले होते हैं। यदि स्थल किसी निश्चित समय तक खाली करना हो, तो तिथि तय होते ही बता दीजिए। मैं पहले से योजना बना लेता हूँ कि कौन सी रीतियाँ संक्षिप्त हों, ताकि मूल विधियों को संक्षिप्त न करना पड़े।
परिवार क्या व्यवस्था करे, और मैं क्या लाता हूँ
परिवार विवाह स्थल पर मंडप की व्यवस्था करता है — हवन कुंड सहित, और उसके चारों ओर परिक्रमा के लिए पर्याप्त स्थान; दोनों पक्षों के बैठने की व्यवस्था; लाजा के लिए कन्या का भाई; सिंदूर और मंगलसूत्र सहित वस्त्र-आभूषण; तथा पूजन सामग्री। तिथि निश्चित होते ही मैं सामग्री की सूची व्हाट्सऐप पर भेज देता हूँ, ताकि कुछ दो बार न खरीदा जाए और कुछ छूटे नहीं। मंडप भवन के भीतर हो तो अग्नि के लिए कोई खिड़की या द्वार खुला रखिए।
मैं विधि लाता हूँ: क्रम, मंत्र, संकल्प और गोत्रोच्चार। लग्न के अनुसार समय साधता हूँ, और प्रत्येक विधि होते समय दोनों परिवारों को उसका अर्थ बताता चलता हूँ — हिंदी में, और जब विदेश में बसे संबंधी देख रहे हों तो अंग्रेज़ी में भी।
पंजीकरण एक पृथक् विषय है
वैदिक विवाह एक संस्कार है। विवाह का पंजीकरण दंपती पर लागू विधि के अंतर्गत एक वैधानिक प्रक्रिया है, जो पंजीयक कार्यालय में होती है, और उसकी व्यवस्था परिवार स्वयं करता है। मैं यह बता सकता हूँ कि कौन सी विधियाँ किस दिन सम्पन्न हुईं। विधिक परामर्श मैं नहीं देता; दस्तावेज़, वीज़ा अथवा आप्रवासन संबंधी प्रश्न उसी कार्यालय अथवा किसी अधिवक्ता के हैं।
परिवार से मुझे क्या चाहिए
- वर और कन्या के पूरे नाम, तथा दोनों कुलों के गोत्र।
- गोत्रोच्चार के लिए दोनों पक्षों की तीन पीढ़ियों के नाम।
- यदि मुहूर्त कुंडली से निकालना हो तो दोनों के जन्म विवरण।
- विवाह स्थल, वह कब तक उपलब्ध है, और बारात के पहुँचने का वास्तविक समय।
- दोनों परिवार कौन सी रीतियाँ रखना चाहते हैं, और कन्यादान कौन करेगा।
विवाह कहाँ सम्पन्न होता है
मैं सुलतानपुर तथा आसपास के जनपदों में विवाह संस्कार सम्पन्न कराता हूँ, और परिवार के आग्रह पर, तिथियाँ अनुकूल हों तो, भारत में अन्यत्र भी जाता हूँ। विदेश में बसे परिवार प्रायः विवाह भारत में करते हैं; मुहूर्त और तैयारी पर बातचीत उनके आने से बहुत पहले व्हाट्सऐप अथवा वीडियो कॉल पर हो सकती है। विवाह ऑनलाइन नहीं हो सकता। वचन अग्नि के सम्मुख खड़े दो व्यक्ति लेते हैं।
कन्यादान का भाव
कन्यादान को शास्त्र महादान कहते हैं, और इसी कारण बहुत से परिवार इसे केवल एक भावुक क्षण मानकर जल्दी में निपटा देते हैं। यह संकल्प है — माता-पिता अपने कुल, गोत्र और पितरों का नाम लेकर, अग्नि और समाज के सम्मुख, एक दायित्व सौंपते हैं, और वर उसे स्वीकार करता है। इसलिए मैं कन्यादान से पूर्व दोनों पक्षों को एक क्षण रुकने को कहता हूँ, ताकि जो कहा जा रहा है वह सुना भी जाए। विवाह के बाकी सब प्रसंग इसी संकल्प के चारों ओर खड़े हैं।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
- हिन्दू विवाह की विधि में कितना समय लगता है?
- मूल विधियाँ — गौरी–गणेश पूजन, कन्यादान, पाणिग्रहण, लाजा होम, सप्तपदी और सिंदूर दान — बिना जल्दबाज़ी के चार से छह घंटे लेती हैं। द्वार पूजा और कुल की रीतियाँ इसमें और समय जोड़ती हैं, इसीलिए अवध में विवाह प्रायः रात भर चलते हैं। यदि स्थल का समय सीमित हो, तो तिथि तय होते ही बताइए; मैं पहले से निश्चित कर लूँगा कि कौन सी रीतियाँ संक्षिप्त हों, ताकि मूल विधि पूर्ण रहे।
- क्या सात फेरे और सप्तपदी एक ही हैं?
- गृह्यसूत्र के क्रम में नहीं। वहाँ अग्नि की परिक्रमाएँ लाजा होम का अंग हैं, और सप्तपदी सात पृथक् पग हैं — प्रत्येक का अपना मंत्र, और अंतिम पग मैत्री का वचन। उत्तर भारत के बड़े भाग में दोनों मिलकर ‘सात फेरे’ कहलाने लगे हैं। मैं कुल की रीति रखता हूँ, और विधि के साथ-साथ बताता चलता हूँ कि कौन सा मंत्र किस विधि का है।
- विवाह मुहूर्त कैसे निकाला जाता है?
- पंचांग से, और जहाँ उपलब्ध हों वहाँ दोनों कुंडलियों से। उत्तर भारत के अधिकांश परिवार खरमास, चातुर्मास तथा गुरु या शुक्र के अस्त काल में विवाह नहीं करते। परंपरा के विवाह-नक्षत्रों को प्राथमिकता दी जाती है, और गुरु बल, सूर्य बल तथा चंद्र बल देखा जाता है। दिन के भीतर लग्न उस समय के लिए निश्चित होता है जब कन्यादान और फेरे वास्तव में होंगे। सभागार बुक करने से पहले मुहूर्त निकलवाइए, बाद में नहीं।
- क्या वैदिक विवाह के बाद भी विवाह का पंजीकरण कराना होता है?
- पंजीकरण एक पृथक् वैधानिक प्रक्रिया है, जिसे परिवार दंपती पर लागू विधि के अंतर्गत पंजीयक कार्यालय में स्वयं कराता है। मैं यह बता सकता हूँ कि कौन सी विधियाँ किस दिन सम्पन्न हुईं। विधिक परामर्श मैं नहीं देता। पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेज़ों, अथवा वीज़ा और आप्रवासन से जुड़े किसी भी प्रश्न के लिए उसी कार्यालय अथवा किसी अधिवक्ता से पूछिए।
- क्या विदेश में बसे परिवारों के लिए विवाह संस्कार ऑनलाइन हो सकता है?
- नहीं। वचन अग्नि के सम्मुख खड़े दो व्यक्ति, अपने परिवारों की उपस्थिति में, लेते हैं। उससे पहले का सब कुछ ऑनलाइन हो सकता है: मुहूर्त, विधियों का क्रम, सामग्री की सूची, और दोनों परिवार कौन सी रीतियाँ रखना चाहते हैं — यह सब व्हाट्सऐप अथवा वीडियो कॉल पर तय हो जाता है। विदेश में बसे अधिकांश परिवार विवाह भारत में करते हैं, और उसके लिए मैं भारत में कहीं भी जाता हूँ।
- अवधि
- मूल विधियाँ 4–6 घंटे
- आयोजन स्थल
- विवाह स्थल अथवा घर पर
- दूरभाष
- +91 94547 82346
वैदिक विवाह संस्कार (हिन्दू विवाह विधि)
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