कथा

घर पर श्री सत्यनारायण व्रत कथा एवं पूजा

घर पर श्री सत्यनारायण कथा — संकल्प, पूजन, पाँचों अध्याय, आरती एवं प्रसाद — पूर्णिमा, गृह प्रवेश अथवा मनौती पूर्ण होने पर।

स्कंद पुराण की श्री सत्यनारायण व्रत कथा — पूजन, पाँचों अध्याय, आरती, पंचामृत एवं पंजीरी — घर पर लगभग दो से तीन घंटे में।

इसमें सम्मिलित

  • परिवार के नाम एवं गोत्र से संकल्प
  • गौरी–गणेश, कलश एवं नवग्रह पूजन
  • श्री सत्यनारायण का षोडशोपचार पूजन
  • पाँचों अध्यायों का वाचन
  • आरती, पंचामृत एवं पंजीरी प्रसाद
  • परिवार की इच्छा हो तो संक्षिप्त हवन

सत्यनारायण कथा के विषय में परिवार प्रायः यही सुनते आए हैं कि यह मनोकामना पूर्ण करने वाली पूजा है — पूर्णिमा पर कथा करा लो, जो माँगा है वह मिल जाएगा। पाँचों अध्याय ध्यान से पढ़िए तो बात लगभग उलटी निकलती है। इसकी प्रत्येक कथा किसी ऐसे वचन पर टिकी है जो दिया गया और फिर टाला गया, अथवा किसी ऐसे प्रसाद पर जो अर्पित हुआ और फिर उपेक्षित रहा — वह वणिक जिसने व्रत का संकल्प किया और बार-बार स्थगित करता रहा, वह राजा जिसने ग्वालों का प्रसाद स्वीकार नहीं किया। सत्यनारायण व्रत सत्य रूप नारायण की उपासना है, और इसकी शिक्षा है दिए हुए वचन का पालन। यह घर का कृतज्ञता-ज्ञापन है, उस सत्य की ओर नियमित, विनम्र वापसी। यह कोई अनुबंध नहीं। इसीलिए अवध के अधिकांश घर गृह प्रवेश पर, मनौती पूर्ण होने पर, अथवा केवल पूर्णिमा के दिन इसी पूजा की ओर जाते हैं।

परिवार कथा कब कराते हैं

  • पूर्णिमा — अनेक घर प्रतिमास अथवा वैशाख, कार्तिक जैसी विशेष पूर्णिमाओं पर यह कथा रखते हैं।
  • गृह प्रवेश, अथवा नई दुकान या कार्यालय का शुभारंभ।
  • किसी व्रत की पूर्णता पर, अथवा जब कोई प्रार्थित कार्य सिद्ध हो जाए।
  • विवाह अथवा विवाह की वर्षगाँठ; जन्मदिवस; संतान का जन्म, अशौच के दिन पूर्ण होने के पश्चात्।
  • संक्रांति, एकादशी, अथवा परिवार द्वारा चुना कोई भी दिन। ग्रंथ इस व्रत को किसी एक तिथि से नहीं बाँधता, और सायंकाल का विधान करता है।

पाँच अध्याय

यह कथा स्कंद पुराण के रेवा खंड की परंपरा से है, और नैमिषारण्य में संवाद रूप में कही जाती है — सूत जी शौनक आदि ऋषियों को वह सुनाते हैं जो भगवान विष्णु ने नारद जी को बताया।

  1. प्रथम अध्याय — पृथ्वी पर दुःख देखकर नारद जी विष्णु भगवान के पास जाते हैं, और भगवान उन्हें सत्यनारायण व्रत तथा उसकी विधि बताते हैं।
  2. द्वितीय अध्याय — काशी के निर्धन ब्राह्मण शतानंद, जिन्हें प्रभु वृद्ध ब्राह्मण के वेश में दर्शन देते हैं; और एक लकड़हारा, जो व्रत होते देखकर स्वयं भी व्रत करता है।
  3. तृतीय अध्याय — भद्रशीला नदी के तट पर राजा उल्कामुख का व्रत; साधु नामक वणिक, जो संतान होने पर व्रत का संकल्प करता है और फिर टालता है; दूर नगर में झूठे आरोप में उसका बंदी होना; घर पर उसकी पत्नी लीलावती एवं पुत्री कलावती का व्रत करना।
  4. चतुर्थ अध्याय — लौटते समय एक संन्यासी से वणिक का असत्य कथन, नौका की संपत्ति का लता-पत्र में बदल जाना, और कलावती का प्रसाद छोड़कर पति से मिलने दौड़ पड़ना।
  5. पंचम अध्याय — राजा तुंगध्वज, जो वृक्ष के नीचे ग्वालों द्वारा दिया प्रसाद स्वीकार नहीं करते, और उसके पश्चात् की घटनाएँ।

मैं प्रत्येक अध्याय का वाचन करके उसका भाव सरल हिन्दी में खोलता हूँ, और जहाँ परिवार को आवश्यकता हो वहाँ अंग्रेज़ी में भी, ताकि कक्ष में बैठे बालक भी जानें कि अध्याय के अंत में शंख क्यों बजाया जाता है।

पूजन की विधि

  1. स्थान को स्वच्छ कर पूर्वाभिमुख चौकी स्थापित की जाती है; जहाँ परिवार की परंपरा हो, उसके चारों कोनों पर केले के खंभों से मंडप बनाया जाता है।
  2. आचमन, पवित्रीकरण एवं संकल्प — देश, तिथि, परिवार का गोत्र एवं नाम, और पूजा का प्रयोजन।
  3. गौरी–गणेश पूजन, वरुण आवाहन सहित कलश स्थापन, तथा नवग्रह पूजन।
  4. शालग्राम अथवा प्रतिमा रूप में श्री सत्यनारायण का षोडशोपचार पूजन — आवाहन एवं आसन से लेकर पंचामृत स्नान, वस्त्र, चंदन, पुष्प एवं तुलसी, फिर धूप, दीप, नैवेद्य एवं तांबूल तक।
  5. पाँचों अध्यायों का वाचन, प्रत्येक अध्याय के अंत में शंखध्वनि।
  6. परिवार की इच्छा हो तो संक्षिप्त हवन।
  7. आरती — यहाँ के अधिकांश घरों में ‘ॐ जय लक्ष्मीरमणा’ — फिर पुष्पांजलि, और उपस्थित सभी जनों द्वारा प्रसाद ग्रहण।

प्रथम आचमन से प्रसाद तक घर पर लगभग दो से तीन घंटे लगते हैं। यह जल्दी निपटाने की पूजा नहीं। अतिथियों को शीघ्र भोजन कराने के लिए तीव्र गति से पढ़ी गई कथा ने रूप तो रखा, सार छोड़ दिया।

पंचामृत, पंजीरी एवं प्रसाद

ग्रंथ नैवेद्य को सवाया मात्रा में बताता है — गेहूँ का आटा अथवा सूजी, घृत, दूध, शर्करा और पका केला, सवा के परिमाण में। यहाँ के अधिकांश घर भुने आटे और शक्कर की पंजीरी बनाते हैं, प्रायः धनिया सहित, और साथ में दूध, दही, घृत, मधु एवं शर्करा का पंचामृत, जिसमें तुलसी दल डाला जाता है। नारायण के नैवेद्य पर तुलसी दल ऐच्छिक नहीं। और प्रसाद सजावट नहीं है — कथा स्वयं इस बात की चेतावनी है कि प्रसाद की उपेक्षा का क्या परिणाम होता है। घर का प्रत्येक सदस्य प्रसाद ग्रहण करता है, और अतिथि थोड़ा घर भी ले जाते हैं।

व्रत

परंपरा से यजमान दंपति कथा पूर्ण होने तक व्रत रखते हैं और प्रसाद से ही उसका पारण करते हैं। अतिथियों से उपवास की अपेक्षा नहीं की जाती। वृद्धजन, मधुमेह के रोगी, गर्भवती स्त्री अथवा जो कोई औषधि ले रहा हो, वे अपने स्वास्थ्य के अनुसार भोजन करें। व्रत संकल्प का अनुशासन है, शरीर की परीक्षा नहीं, और यह कभी चिकित्सकीय परामर्श का स्थान नहीं लेता।

परिवार क्या व्यवस्था करता है, मैं क्या लेकर आता हूँ

चौकी, स्वच्छ स्थान, पुष्प, तुलसी, प्रसाद एवं पंचामृत की व्यवस्था परिवार करता है। आचमन से आरती तक सम्पूर्ण क्रम मैं संपन्न कराता हूँ, और पूजा हेतु अपनी ओर की आवश्यक वस्तुएँ साथ लाता हूँ। तिथि निश्चित होने पर सामग्री सूची WhatsApp पर भेज दी जाती है, जिसमें स्पष्ट अंकित रहता है कि गृहस्थ को क्या जुटाना है। दक्षिणा की बात भी पूजा से पूर्व WhatsApp पर हो जाती है। कोई पैकेज नहीं, कोई ऑनलाइन भुगतान नहीं।

समय एवं तिथि

अधिकांश परिवार पूर्णिमा रखते हैं, किंतु तिथि पंचांग से देख ली जाती है, क्योंकि पूर्णिमा प्रायः पिछले दिन के अपराह्न में ही लग जाती है। सायंकाल, जब घर के सब लोग उपस्थित हों और दीप जल चुके हों, कथा के लिए सर्वोत्तम है। गृह प्रवेश पर कथा प्रायः उसी दिन प्रवेश के पश्चात्, अथवा नए घर के आरंभिक दिनों में रखी जाती है। मनौती पूर्ण होने पर — जितनी शीघ्र, उतना उचित; विलंब ही वह बात है जिससे तृतीय अध्याय सावधान करता है।

कथा किस रूप में होती है

सत्यनारायण घर की पूजा है। मेरे द्वारा कराई जाने वाली अधिकांश कथाएँ सुलतानपुर एवं आस-पास के जनपदों में होती हैं। भारत में अन्यत्र यह प्रायः किसी बड़े आयोजन के साथ जुड़ती है — नवग्रह शांति सहित गृह प्रवेश, अथवा कथा सप्ताह — क्योंकि दो घंटे की पूजा अकेले लंबी यात्रा को उचित नहीं ठहराती।

विदेश में बसे परिवारों के लिए ईमानदार रूप मार्गदर्शित पूजा है। परिवार अपने घर में स्वयं चौकी सजाता है और अपने ही हाथों से उपचार अर्पित करता है, जबकि मैं जीवंत वीडियो कॉल पर उनके साथ संकल्प कराता हूँ और अध्यायों का वाचन करता हूँ। उनकी अनुपस्थिति में उनके लिए कुछ नहीं किया जाता। पूजा उनकी है; मैं उनके साथ पढ़ रहा हूँ।

कथा क्या नहीं है

यह किसी फल के बदले दिया गया भुगतान नहीं। मैं यह वचन नहीं देता कि सत्यनारायण कथा से नौकरी, विवाह, संतान, रोगमुक्ति अथवा व्यापार में लाभ मिलेगा। यह कृतज्ञता है, और अपने वचन पर टिके रहने का स्मरण। जो घर प्रत्येक पूर्णिमा यह कथा रखते हैं, उनमें बदलता घर का भाग्य नहीं, घर का साथ बैठने का स्वभाव है।

एक स्मरण — संकल्प और विलंब

मेरे पास अनेक परिवार यह कहते हुए आते हैं कि उन्होंने वर्षों पहले कोई मनौती मानी थी — ‘काम हो जाएगा तो सत्यनारायण कथा कराएँगे’ — और काम होने के बाद बात टलती चली गई। ऐसे परिवारों से मैं भय की भाषा में बात नहीं करता। कथा स्वयं बताती है कि साधु वणिक ने भी यही किया था, और जब उसने अपनी भूल मानी, तो क्रम पुनः सहज हो गया। अतः संकोच छोड़कर, जितनी शीघ्र सुविधा हो, संकल्प पूर्ण कर लीजिए। विलंब का प्रायश्चित भय नहीं, पूर्ति है।

आपसे क्या चाहिए

  • अवसर, और एक वाक्य में संकल्प का प्रयोजन।
  • संभावित तिथि-अवधि, और क्या सायंकाल संभव है।
  • घर पर पूजा हो तो पता; मार्गदर्शित पूजा हो तो नगर एवं समय-क्षेत्र।
  • गोत्र, तथा बैठने वाले सदस्यों के नाम।
  • लगभग कितने अतिथि प्रसाद ग्रहण करेंगे।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

सत्यनारायण कथा कब करानी चाहिए?
अधिकांश परिवार इसे पूर्णिमा पर रखते हैं — प्रतिमास, अथवा वैशाख, कार्तिक जैसी विशेष पूर्णिमाओं पर। गृह प्रवेश, व्रत अथवा मनौती पूर्ण होने पर, वर्षगाँठ या जन्मदिवस पर, तथा संक्रांति अथवा एकादशी पर भी यह होती है। ग्रंथ इसे किसी एक तिथि से नहीं बाँधता और सायंकाल का विधान करता है। पूर्णिमा पंचांग से देख लें, क्योंकि वह प्रायः पिछले दिन के अपराह्न में लग जाती है।
सत्यनारायण पूजा में कितना समय लगता है?
घर पर प्रथम आचमन से प्रसाद तक लगभग दो से तीन घंटे। इसमें संकल्प, गौरी–गणेश, कलश एवं नवग्रह पूजन, श्री सत्यनारायण का षोडशोपचार पूजन, पाँचों अध्याय, आरती, तथा परिवार चाहे तो संक्षिप्त हवन सम्मिलित है। अतिथियों को शीघ्र भोजन कराने के लिए इसे जल्दी नहीं निपटाना चाहिए; कथा स्वयं एकाग्रता और वचन-पालन की है।
क्या सत्यनारायण कथा ऑनलाइन हो सकती है?
विदेश में बसे परिवारों के लिए हाँ — मार्गदर्शित पूजा के रूप में, उसी नाम से। परिवार अपने घर में स्वयं चौकी सजाता है और अपने हाथों से उपचार अर्पित करता है, जबकि मैं जीवंत वीडियो कॉल पर संकल्प कराता हूँ और पाँचों अध्यायों का वाचन करता हूँ। उनकी अनुपस्थिति में उनकी ओर से कुछ नहीं किया जाता। सुलतानपुर एवं आस-पास के जनपदों में कथा घर पर प्रत्यक्ष होती है।
क्या सत्यनारायण कथा के लिए उपवास आवश्यक है?
परंपरा से यजमान दंपति कथा पूर्ण होने तक व्रत रखते हैं और प्रसाद से उसका पारण करते हैं। अतिथियों से उपवास की अपेक्षा नहीं होती। वृद्धजन, मधुमेह के रोगी, गर्भवती स्त्रियाँ तथा जो औषधि ले रहे हों, वे स्वास्थ्य के अनुसार भोजन करें; व्रत संकल्प का अनुशासन है, शरीर की परीक्षा नहीं, और यह कभी चिकित्सकीय परामर्श का विकल्प नहीं।
सत्यनारायण कथा में कौन सा प्रसाद बनता है?
ग्रंथ सवा के परिमाण में गेहूँ का आटा अथवा सूजी, घृत, दूध, शर्करा एवं पका केला बताता है। यहाँ के अधिकांश घर भुने आटे और शक्कर की पंजीरी बनाते हैं, प्रायः धनिया सहित, और साथ में दूध, दही, घृत, मधु एवं शर्करा का पंचामृत। नैवेद्य पर तुलसी दल अनिवार्य है। उपस्थित सभी जन प्रसाद ग्रहण करते हैं; कथा स्वयं उसकी उपेक्षा से सावधान करती है।
अवधि
2–3 घंटे
आयोजन स्थल
घर पर
दूरभाष
+91 94547 82346
WhatsApp पर तिथि पूछें

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