संस्कार एवं गृह पूजा
नामकरण संस्कार — नक्षत्र-अक्षर से शिशु का नाम
नवजात शिशु का घर पर नामकरण — नक्षत्र-अक्षर, पूजन, और पिता के मुख से पहली बार उच्चारित नाम।
सूतक के पश्चात्, प्रायः ग्यारहवें या बारहवें दिन, घर पर नामकरण संस्कार: पूजन, नाम के लिए नक्षत्र का चरण-अक्षर, और परिवार का आशीर्वाद।
इसमें सम्मिलित
- जन्म समय से नक्षत्र एवं चरण-अक्षर
- सूतक की समाप्ति पर शुद्धि
- संकल्प, गणेश पूजन एवं कलश स्थापना
- शिशु के कान में नाम-उच्चारण एवं चावल की थाली पर नाम-लेखन
- लघु हवन एवं वरिष्ठजनों का आशीर्वाद
नामकरण के विषय में परिवारों से प्रायः दो में से एक बात कही जाती है। या तो यह कि नाम उसी अक्षर से आरंभ होना चाहिए जो पंडित जी बताएँ, अन्यथा कोई नाम नहीं चलेगा; या यह कि नक्षत्र का अक्षर पुरानी आदत है और जो नाम मन को भा गया है वही पर्याप्त है। परंपरा में यह संस्कार इन दोनों में से किसी रूप में नहीं बैठता। नामकरण वह संस्कार है जिसमें शिशु को पहली बार घर-परिवार और कुल-देवताओं के सम्मुख उसके नाम से पुकारा जाता है। नक्षत्र-अक्षर का इसमें वास्तविक स्थान है। उतना ही स्थान उस नाम का भी है जिसे माँ महीनों से मन में सँजोए बैठी है।
नामकरण कब होता है
प्राचीन ग्रंथ नामकरण को जन्म के दसवें अथवा बारहवें दिन रखते हैं। व्यवहार में अधिकांश परिवार पहले सूतक पूर्ण होने देते हैं — जन्म का वह अशौच-काल जिसकी अवधि कुल की परंपरा से निश्चित होती है, सामान्यतः दस दिन — और घर की शुद्धि तथा माँ और शिशु के शुद्धि-स्नान के पश्चात् ग्यारहवें या बारहवें दिन नामकरण करते हैं। अवध के अनेक घरों में यह बरही के साथ ही सम्पन्न होता है।
यह दिन परंपरा है, अंतिम सीमा नहीं। यदि माँ को विश्राम चाहिए, शिशु अभी चिकित्सक की देखरेख में है, अथवा दादा-दादी को उपस्थित होने के लिए यात्रा करनी है, तो नामकरण आगे किसी मुहूर्त में किया जाता है — पहले कुछ मासों में, और कुछ कुलों में प्रथम वर्ष के भीतर। वह दिन मैं पंचांग से निकालता हूँ: तिथि, वार और नक्षत्र देखे जाते हैं, तथा रिक्ता तिथियाँ — चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी — प्रायः टाली जाती हैं। थकी हुई माँ के चारों ओर जल्दी में किए गए नामकरण से शांत मन से चुना गया बाद का दिन कहीं श्रेष्ठ है।
नक्षत्र और चरण-अक्षर
नक्षत्र सत्ताईस हैं, और प्रत्येक के चार चरण, जिन्हें पाद भी कहते हैं। प्रत्येक चरण का एक अक्षर है। प्रथम नक्षत्र अश्विनी के चारों चरणों के अक्षर हैं — चू, चे, चो और ला। जन्म के क्षण चंद्रमा किसी एक नक्षत्र के किसी एक चरण में होता है; उसी चरण का अक्षर शिशु के नाम का पारंपरिक प्रथम अक्षर है, और वही कुंडली में लिखे जाने वाले राशि-नाम का आधार भी है।
चंद्रमा एक चरण में लगभग छह घंटे रहता है। एक घंटे की त्रुटि प्रायः कुछ नहीं बदलती, किंतु चरण की सीमा के निकट वह अक्षर बदल देती है, और नक्षत्र की सीमा के निकट उससे भी अधिक। इसीलिए मैं जन्म समय स्मृति से नहीं, चिकित्सालय के अभिलेख से माँगता हूँ। जहाँ जन्म किसी सीमा के समीप हो, मैं परिवार को स्पष्ट बताता हूँ, और यह भी कि सीमा के दोनों ओर कौन-कौन से अक्षर आते हैं।
यदि जन्म गंडमूल नक्षत्र में हुआ हो
इस अंचल में जब शिशु का जन्म अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल अथवा रेवती में होता है, तो परिवार प्रायः ‘मूल’ के विषय में पूछते हैं। परंपरा मूल शांति का विधान उस दिन करती है जब चंद्रमा पुनः जन्म-नक्षत्र में लौटता है — जन्म से लगभग सत्ताईसवें दिन। यह एक पृथक् शांति है, जो शांत मन से की जाती है; यह शिशु पर कोई निर्णय नहीं। इसके कारण नामकरण रुकना आवश्यक नहीं, और नामकरण इसका स्थान नहीं लेता।
जो नाम आपको पहले से प्रिय है
बहुत से माता-पिता पहले से चुना हुआ नाम लेकर आते हैं, और वह चरण-अक्षर से आरंभ नहीं होता। उसे छोड़ने की आवश्यकता नहीं। इस परंपरा में परिवार बहुत समय से इसे इन रीतियों से सँभालते आए हैं:
- यदि चरण-अक्षर से आरंभ होने वाला कोई नाम परिवार को प्रिय लगे, तो वही रखा जाए।
- प्रिय नाम को व्यावहारिक नाम के रूप में रखा जाए — जिससे शिशु पुकारा जाएगा — और चरण-अक्षर पर एक दूसरा नाम राशि-नाम के रूप में, जो कुंडली में लिखा जाए और संकल्प तथा पूजन में लिया जाए। यहाँ के घरों में पीढ़ियों से दो नाम चलते आए हैं।
- उसी नक्षत्र के शेष तीन अक्षरों में से किसी का प्रयोग किया जाए। मैं परिवार को बता देता हूँ कि चरण का अपना अक्षर कौन सा है, और वे यह जानते हुए चुनते हैं।
नाम जो भी हो, उसका ऐसा अर्थ होना चाहिए जिसे माता-पिता एक दिन बालक को समझा सकें। गृह्यसूत्र तो नाम की ध्वनि तक पर विचार करते हैं — अक्षरों की संख्या, कोमल व्यंजन। आज कम ही परिवार उन नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं। जिज्ञासा हो तो मैं उनकी चर्चा करता हूँ, किंतु किसी पर उन्हें थोपता नहीं।
संस्कार की विधि
नामकरण घर पर होता है और लगभग डेढ़ घंटा लेता है। माँ शिशु को गोद में लेकर पिता के समीप बैठती हैं, और जो क्रम मैं अपनाता हूँ वह यह है:
- शुद्धि — घर की स्वच्छता, गंगाजल का छिड़काव, तथा माँ और शिशु का स्नान। इससे सूतक की समाप्ति होती है।
- संकल्प — पिता कुल, गोत्र, तिथि, स्थान और प्रयोजन का उच्चारण करते हुए संकल्प लेते हैं।
- गणेश पूजन एवं कलश स्थापना; जहाँ कुल की परंपरा हो, मातृका पूजन और नवग्रह आवाहन भी।
- नांदी श्राद्ध — मांगलिक संस्कार से पूर्व पितरों का स्मरण — जहाँ यह कुल की रीति हो।
- नामकरण — पिता चुना हुआ नाम धीरे से शिशु के दाहिने कान में कहते हैं। फिर चावल बिछी थाली पर नाम लिखा जाता है और परिवार के सामने उच्चारित किया जाता है।
- वरिष्ठजन एक-एक करके शिशु को उसके नाम से पुकारते हैं और आशीर्वाद देते हैं।
- लघु हवन — अग्नि छोटी, और शिशु से भली-भाँति दूर।
- आशीर्वाद, प्रसाद और दान, गृह की सामर्थ्य के अनुसार।
कुछ परिवार उसी दिन निष्क्रमण संस्कार — शिशु का पहली बार घर से बाहर निकलकर सूर्य-दर्शन — भी जोड़ लेते हैं। यह एक पृथक् संस्कार है। परिवार चाहे तो मैं इसका अर्थ बताकर इसे नामकरण के पश्चात् रख देता हूँ।
उस दिन माँ और शिशु की देखभाल
नवजात का दिन छोटा होता है और प्रसूता की शक्ति सीमित। मैं विधि को बिना जल्दबाज़ी के, पर अनावश्यक रूप से लंबा किए बिना, सम्पन्न कराता हूँ। समय ऐसा रखिए जब शिशु प्रायः सोता या दूध पीता हो; कमरा हवादार रहे; और शिशु के पास बहुत लोग न हों। माँ के स्वास्थ्य-लाभ और शिशु के विषय में चिकित्सक ने जो परामर्श दिया है, वह सर्वप्रथम है। संस्कार प्रतीक्षा कर सकता है; उनका विश्राम नहीं।
परिवार क्या व्यवस्था करे, और मैं क्या लाता हूँ
परिवार घर में पूजन का स्थान, शिशु के नए वस्त्र, नाम लिखने के लिए थाली और चावल, तथा पूजन सामग्री की व्यवस्था करता है। तिथि निश्चित होते ही मैं सामग्री की सूची व्हाट्सऐप पर भेज देता हूँ। मैं विधि लाता हूँ — संकल्प, मंत्र और क्रम — और प्रत्येक चरण होते समय परिवार को उसका अर्थ बताता चलता हूँ, ताकि दादा-दादी और माता-पिता जानें कि उनके शिशु के ऊपर क्या कहा जा रहा है।
परिवार से मुझे क्या चाहिए
- चिकित्सालय के अभिलेख से जन्म तिथि, समय और स्थान।
- माता-पिता के नाम और कुल का गोत्र।
- जिन नामों पर पहले से विचार हो रहा है।
- कुल की रीतियाँ — नामकरण बरही के साथ होगा या नहीं, कुलदेवता का स्मरण पहले होता है या नहीं।
- दो-तीन दिन जो घर के लिए सुविधाजनक हों।
नामकरण कहाँ होता है
मैं सुलतानपुर और आसपास के जनपदों में घर पर नामकरण संस्कार सम्पन्न कराता हूँ, और परिवार के आग्रह पर भारत में अन्यत्र भी जाता हूँ। अक्षर और नाम का विचार पूर्णतः व्हाट्सऐप अथवा वीडियो कॉल पर हो सकता है — कहीं भी रहने वाले माता-पिता के लिए, विदेश में बसे परिवारों सहित। संस्कार स्वयं परिवार अपने घर में, एक साथ बैठकर करता है। विदेश में बसे माता-पिता को मैं पहले कॉल पर पूरा क्रम समझा देता हूँ, ताकि पिता स्वयं नाम का उच्चारण कर सकें; और बहुत से परिवार हवन सहित पूर्ण विधि अपनी अगली भारत-यात्रा पर करते हैं। मैं किसी परिवार से यह नहीं कहूँगा कि स्क्रीन पर बैठे पुरोहित ने उनके घर में संस्कार सम्पन्न कर दिया।
नाम एक आशीर्वाद है
हमारी परंपरा में नाम केवल पहचान का चिह्न नहीं। जिस नाम से बालक जीवन भर पुकारा जाएगा, उसे पहली बार पिता के मुख से, देवताओं के सम्मुख, संकल्प के साथ सुनना — यही नामकरण का सार है। इसलिए मैं परिवारों से कहता हूँ कि नाम चुनते समय अक्षर की गणना के साथ उसके अर्थ पर भी ठहरें। वही अर्थ आगे चलकर बालक के लिए एक मौन आशीर्वाद बनता है, जिसे वह हर बार अपना नाम सुनकर दोहराता है।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
- जन्म के कितने दिन बाद नामकरण होता है?
- परंपरा से दसवें अथवा बारहवें दिन। अधिकांश परिवार सूतक की समाप्ति की प्रतीक्षा करते हैं और ग्यारहवें या बारहवें दिन, प्रायः बरही के साथ, नामकरण करते हैं। यह परंपरा है, अंतिम सीमा नहीं। यदि माँ को विश्राम चाहिए अथवा शिशु चिकित्सक की देखरेख में है, तो नामकरण पहले कुछ मासों में किसी अन्य मुहूर्त पर होता है, और कुछ परिवार इसे प्रथम वर्ष के भीतर करते हैं।
- यदि पसंद का नाम नक्षत्र-अक्षर से आरंभ न हो तो क्या करें?
- उसे रखिए। उसे व्यावहारिक नाम बनाइए, जिससे शिशु पुकारा जाएगा, और चरण-अक्षर पर एक दूसरा नाम राशि-नाम के रूप में रखिए — कुंडली, संकल्प और पूजन के लिए। यहाँ के बहुत से घरों में पीढ़ियों से दो नाम चलते आए हैं। अथवा उसी नक्षत्र के अन्य अक्षरों में से चुनिए, यह जानते हुए कि चरण का अपना अक्षर कौन सा है।
- क्या जन्म समय से नाम का अक्षर बदल जाता है?
- कभी-कभी। चंद्रमा एक चरण में लगभग छह घंटे रहता है, अतः एक घंटे की त्रुटि प्रायः कुछ नहीं बदलती। चरण की सीमा के निकट वह अक्षर बदल देती है, और नक्षत्र की सीमा के निकट उससे अधिक। जन्म समय चिकित्सालय के अभिलेख से लाइए। यदि जन्म किसी सीमा के समीप हो, तो मैं स्पष्ट बताऊँगा, और यह भी दिखाऊँगा कि दोनों ओर कौन सा अक्षर आता है।
- विदेश में जन्मे शिशु का नामकरण कैसे हो?
- अक्षर और नाम का विचार विदेश के जन्म-स्थान के आधार पर पूर्णतः व्हाट्सऐप अथवा वीडियो कॉल पर हो सकता है। संस्कार स्वयं परिवार अपने घर में करता है। मैं पहले कॉल पर माता-पिता को पूरा क्रम समझा सकता हूँ, ताकि पिता स्वयं नाम का उच्चारण करें। बहुत से परिवार हवन सहित पूर्ण विधि अपनी अगली भारत-यात्रा पर करते हैं।
- शिशु का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ है — क्या इससे नामकरण पर प्रभाव पड़ता है?
- नामकरण पर नहीं। अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती में जन्म के लिए परंपरा एक पृथक् मूल शांति रखती है, जो उस दिन होती है जब चंद्रमा पुनः जन्म-नक्षत्र में लौटता है — जन्म से लगभग सत्ताईसवें दिन। यह शांत मन से की जाने वाली शांति है, शिशु पर कोई निर्णय नहीं। नामकरण कुल की रीति के अनुसार अपने दिन पर ही होता है।
- अवधि
- लगभग डेढ़ घंटा
- आयोजन स्थल
- घर पर; नाम-विचार ऑनलाइन भी
- दूरभाष
- +91 94547 82346
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