गोवर्धन पूजा 2026 — मंगलवार 10 नवम्बर, अन्नकूट, दूसरी दीवाली नहीं

प्रकाशित: 31 अक्टूबर 2026 · आचार्य कृष्ण कांत श्रीमुख शांडिल्य जी महाराज · 8 मिनट का पाठ
गोवर्धन पूजा उस दिन आती है जब घर पहले ही बहुत कुछ कर चुका होता है। लोग उसे छोटी दीवाली खोजते हैं, या रविवार रात में समेट लेते हैं क्योंकि मिठाई अभी मेज़ पर है। वह दोनों नहीं है। जिस पंचांग पर मैं चलता हूँ, गोवर्धन पूजा 2026 मंगलवार 10 नवम्बर है। लक्ष्मी पूजा रविवार 8 नवम्बर थी। भाई दूज बुधवार 11 नवम्बर है। यह मैं 31 अक्टूबर 2026 को सुलतानपुर से लिख रहा हूँ। मंगलवार अपना संकल्प है: कृष्ण, अन्न का ढेर, और बहुत आँगनों में गोबर का छोटा गोवर्धन। वह अमावस्या का दीप नहीं जिसे सोमवार व्यस्त था इसलिए फिर जलाया जाए।
यदि दिन अपने नगर के लिए पढ़वाना हो, या घर के नाम एक छोटी बैठक, तो WhatsApp पर लिखिए। नगर, और पूजा घर में है या आँगन में। मैं सुलतानपुर में हूँ। इस पृष्ठ पर शुल्क नहीं। अन्न वर्ष भर के अनाज को नहीं खरीदता, और मैं नहीं कहूँगा कि खरीदता है।
मंगलवार सप्ताह में कहाँ बैठता है
शुक्रवार 6 नवम्बर धनतेरस है। रविवार 8 नवम्बर लक्ष्मी पूजा। मंगलवार 10 नवम्बर गोवर्धन। बुधवार 11 नवम्बर भाई दूज। इस स्थल पर एक लेख दिल्ली के फ्लैट की दीवाली का है, और एक जयपुर के आँगन और बही का। वे पृष्ठ रविवार पर रुकते हैं। यह पृष्ठ तब शुरू होता है जब रविवार के दीप बुझ चुके हों और रसोई अभी भरी हो। सप्ताह ‘निपटाने’ के लिए अन्नकूट रविवार रात मत कीजिए। गोवर्धन की तिथि शुक्ल प्रतिपदा है, अमावस्या की रात के बाद का दिन। मंगलवार प्रातः अपने नगर की पुष्टि कीजिए। दिल्ली का चित्र पटना की प्रातः नहीं, और मन्दिर का जयपुरी अन्नकूट आपकी रसोई नहीं।
साधारण घर में पूजा दिन में है, दीवाली के प्रदोष में नहीं। गायें, यदि गली में अब भी हों, खिलाई और मानी जाती हैं। पहाड़ी उठती है — गाँव में गोबर, जहाँ गोबर सम्भव न हो वहाँ चावल और मिठाई का ढेर — और अन्न अन्नकूट की तरह चढ़ता है, ढेर, चित्र के लिए एक लड्डू नहीं। ढेर छोटा हो सकता है। बात यह है कि वह अन्न घर ने पकाया हो या ईमानदारी से खरीदा हो, और किसी के भोजन बनाने से पहले चढ़े। रविवार की बची मिठाई सजाकर अन्नकूट कहना थकी मिठाई है, विधि नहीं।
घर वास्तव में क्या करता है
बुहारिए। भूमि लिखते हों तो छोटी लिखिए। पहाड़ी वहाँ रखिए जहाँ पाँव न लगें। दीप जलाइए। घर के नाम से अन्न चढ़ाइए। जयपुर या ब्रज से छुए परिवार में दिन बड़ा होता है, और मन्दिर का अन्नकूट मुख्य कृत्य हो सकता है। सुलतानपुर के आँगन में अक्सर कुल की पहाड़ी और गली की गायें होती हैं। दोनों गोवर्धन हैं। मन्दिर का आकार दो कमरे के फ्लैट में नकल करके यह मत समझिए कि आप चूक गए। थाल पर बीस वस्तुएँ, ध्यान से चढ़ीं, अन्नकूट हैं। समूह को दिखाने को मँगवाई सौ वस्तुएँ खान-सामग्री का बिल हैं।
पहाड़ी की परिक्रमा कीजिए यदि यह आपके घर की आदत हो, और बच्चों को कृष्ण और पर्वत की कथा कहिए। कथा कथा है। वह वचन नहीं कि परिक्रमा से आपकी छत आँधी रोक लेगी। पूछे जाने पर मैं कहता हूँ। परिक्रमा को बीमा नहीं बेचता।
फिर घर खाता है। बिना खाए गोवर्धन प्रदर्शन है। चढ़ावा प्रसाद बनकर लौटता है। उसे गली में जो भूखा हो उसे भी दीजिए, केवल उन्हें नहीं जो सजावट की प्रशंसा कर सकें।
मंगलवार क्या नहीं है
वह भाई दूज नहीं। तिलक बुधवार है। जो बहनें दोनों मंगलवार को निपटाना चाहें क्योंकि बुधवार भोर में रेल है, वे बुधवार प्रातः छोटा तिलक रख सकें तो रखें, और यह नाटक न करें कि मंगलवार का अन्नकूट भाई की विधि था। भाई दूज अलग पृष्ठ उठा सकता है। यह पृष्ठ उसे नहीं निगलेगा।
वह विवाह या गृहप्रवेश का मुहूर्त नहीं है केवल इसलिए कि रसोई पहले से त्योहार के तेल में है। मुहूर्त चाहिए तो वह दूसरा प्रश्न है, अपने नगर और अपने खाली दिनों की सूची के साथ। हलवाई का भुगतान हो गया इसलिए मंगलवार मत पकड़िए।
वह उपवास नहीं जो कुछ सिद्ध करे। खाइए। बच्चे खाएँ। रोगी खाए। किसी दृश्य ने इसे छठ से मिला दिया इसलिए गोवर्धन का निर्जला व्रत भ्रम है। छठ अगला सप्ताह है, शुक्रवार 13 नवम्बर से सोमवार 16 नवम्बर तक। दूसरा संकल्प, दूसरा जल, दूसरे अन्न।
पढ़ाई, यदि दिन उलझा हो
कुछ घर इसलिए लिखते हैं कि माता-पिता नहीं रहे और वे नहीं जानते शोक के वर्ष में अन्नकूट उचित है या नहीं। कुछ इसलिए कि परिवार के दो नगर तिथि पर झगड़ते हैं। नगर और सन्देह एक पंक्ति में भेजिए। मैं शोक के घर को ऐसी दावत नहीं बनाऊँगा जिसे वे सँभाल न सकें, और समूह की बातचीत खुश करने को दूसरा गोवर्धन नहीं गढ़ूँगा। एक नगर, एक प्रातः, एक पहाड़ी।
द्वार WhatsApp है। नगर लिखिए। घर या मन्दिर कहिए। मैं सुलतानपुर में हूँ। यात्रा तब जब तिथि तय हो और घर ने माँगा हो। भारत में बैठक यदि आप आएँ। सीधा वचन यदि पहाड़ी अन्यत्र हो और आपको केवल दिन की पुष्टि चाहिए। दक्षिणा पहले कही जाती है, दर-पत्र पर नहीं। ऑनलाइन भुगतान नहीं।
पहाड़ी कैसे खिलाई जाती है
सुलतानपुर के आँगन में पहाड़ी पहले बनती है, अपने लिए थाल लगने से पहले। चरण में दीप। जल। फिर अन्न, उसी क्रम में जिस क्रम में रसोई ने उसे पूरा किया: अनाज, दाल, शाक, मिठाई, और फल यदि उस प्रातः बाज़ार में था। गाय गली में बिना राह रोके आ सके तो परिवार के बैठने से पहले उसे खिलाया जाता है। जिस घर में गाय नहीं, वह मंगलवार हारा नहीं। जहाँ पड़ोसी रखता हो वहाँ घास दे दीजिए, या दिन को केवल अन्न की पहाड़ी रहने दीजिए। चित्र के लिए बछड़ा किराए पर मत लाइए और भूखा वापस मत भेजिए। गाय साज-सज्जा नहीं, और चित्र संकल्प नहीं।
छप्पन भोग मन्दिर का वाक्य है। जो घर आठ वस्तुएँ पकाए और उनका नाम जानता हो, उसने अन्नकूट रखा। जो छप्पन डिब्बे मँगाए और भीतर क्या है यह न कह सके, उसने हलवाई रखा। जो चढ़ाओ उसे खाओ। जो बुधवार रात तक डिब्बे में पड़ा रहे, वह मंगलवार प्रातः मँगवाने योग्य नहीं था। सड़ा प्रसाद सम्मान नहीं। शेष उसी दिन बाँटिए, गली में, उन्हें भी जो सजाने नहीं आए। केवल मेज़बान का खाया ढेर एक निजी भोजन है जिस पर कथा चिपका दी गई।
बच्चे परिक्रमा करें जब आँगन परिक्रमा देने योग्य हो। फ्लैट में परिक्रमा मेज़ के गिर्द एक धीमा चक्कर है, और साथ में कथा। कृष्ण ने पर्वत इसलिए उठाया कि गाँव उसके नीचे खड़ा रह सके। मैं इसे दिन की कथा कहता हूँ। मैं यह वचन नहीं कहता कि चक्कर से आपकी छत, आपका काम, या बच्चे का वर्ष सँभल जाएगा। कथा का वर्षा वर्षा है। आपकी वर्षा, आपकी छत, आपका वर्ष अपने स्थान पर रहते हैं।
एक रसोई, चाहे बेटे अन्यत्र हों
दूसरे नगर का बेटा अक्सर धन भेजता है और माता-पिता से कहता है कि गोवर्धन ‘ठीक से’ करें। माता-पिता की रसोई ही विधि है। उसका भेजा धन सहायता है। वह दूसरा अन्नकूट नहीं जिसे दो स्थानों पर मूल कहकर मनाया जाए। अपनी पहाड़ी चाहिए तो वह वहीं छोटी बनाए जहाँ वह खाता है, मंगलवार को, दिन के उजाले में, उस अन्न से जिसे वह सच में खाएगा। वह माता से यह न कहे कि गोबर के ऊपर फ़ोन पकड़ें ताकि समूह आकार की स्वीकृति दे दे। स्वीकृति पूजा का अंग नहीं।
भारत से बाहर की रसोई उस मंगलवार का उपयोग करती है जहाँ चावल पक रहा हो। मैं दिल्ली के दोपहर में से डेढ़ घण्टा घटाकर उस रसोई का मुहूर्त नहीं बनाऊँगा। खाड़ी का दोपहर खाड़ी का दोपहर है। नेपाल की प्रातः नेपाल की प्रातः है, दिल्ली की घड़ी में पन्द्रह मिनट जोड़ने से पूर्व की नहीं। यदि सन्देह केवल नागरिक तिथि का है, तो उत्तर भारत के जिस पत्र पर मैं चल रहा हूँ वह मंगलवार 10 नवम्बर 2026 है। यदि सन्देह दूसरे नगर के आकाश का है, तो नगर का नाम भेजिए, मैं उस प्रातः को पढ़ूँगा। अन्न को आँगन में मेरी उपस्थिति नहीं चाहिए। उलझी तिथि को चाहिए।
शोक आकार बदलता है, ईमानदारी नहीं। मृत्यु के पहले वर्ष का घर शान्त पहाड़ी रख सकता है, भीड़, लाउडस्पीकर और किराए का प्रदर्शन छोड़कर। मैं नहीं कहूँगा कि दावत न सँभाल सकने से उन्होंने कार्तिक तोड़ दिया। मैं यह नियम भी नहीं गढ़ूँगा कि पूरे वर्ष अन्नकूट निषिद्ध है, क्योंकि यह नियम मुझे हर कुल पर रखने को नहीं मिला। उन बड़ों से पूछिए जो उस रसोई में सच में बैठे हैं। वे आपस में असहमत हों तो नगर और मृत्यु का वर्ष भेजिए। मैं कहूँगा क्या रखता और क्या छोड़ता। मैं बड़ा ढेर बेचकर माता-पिता की शान्ति का वचन नहीं दूँगा। शान्ति ढेर का फल नहीं है।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
गोवर्धन पूजा 2026 कब है?
मंगलवार 10 नवम्बर 2026। दीवाली की रात रविवार 8 नवम्बर थी। भाई दूज बुधवार 11 नवम्बर है। प्रातः अपने नगर में देखिए।
क्या अन्नकूट दीवाली ही है?
नहीं। दीवाली की लक्ष्मी पूजा अमावस्या की सायं है। अन्नकूट अगले दिन का अन्न है। मिठाई बची है इसलिए दोनों को मत मिलाइए।
क्या फ्लैट में गोबर की पहाड़ी अनिवार्य है?
नहीं। चावल और अन्न का ढेर फ्लैट सँभाल सकता है। गोबर की पहाड़ी वहीं है जहाँ घर वह रूप पहले से रखता हो। चित्र के लिए उसे मत लाइए।
क्या चढ़ावा समृद्धि की गारन्टी है?
नहीं। वह चढ़ा और फिर खाया अन्न है। अनाज, धन, या बच्चे के स्वास्थ्य का अनुबन्ध नहीं।
यदि मंगलवार को सुलतानपुर से एक वचन चाहिए
यह पृष्ठ गोवर्धन पूजा 2026 है, पहाड़ी और अन्न का ढेर। मैं आचार्य कृष्ण कान्त हूँ। इस स्थल का काम वह बैठक है जो मैं सुलतानपुर से लगभग बीस वर्ष से रखे हूँ। नगर और रसोई साफ हों तो दिन रखिए। न हों तो WhatsApp पर भेजिए। मैं अन्न पर फल नहीं जोड़ूँगा।
सेवा एवं प्रस्तावित तिथि साझा करें। तिथि सुनिश्चित करने हेतु आपको WhatsApp पर संदेश प्राप्त होगा। किसी खाते की आवश्यकता नहीं।
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